कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन कुछ खेती के तरीके पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा करते हैं। भारत स्थित वराह कार्बन क्रेडिट जेनरेशन दृष्टिकोण के माध्यम से फसल अवशेष जलाने और चावल के खेतों में बाढ़ को कम करता है। कंपनी विभिन्न देशों में छोटे किसानों के साथ सहयोग करती है। साथ में वे पुनर्योजी खेती के तरीकों को बढ़ावा देने और उत्सर्जन को कम करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
दिल्ली स्थित स्टार्टअप वराहा , विश्वभर में 100 से अधिक साझेदारों के साथ मिलकर छोटे किसानों को टिकाऊ और पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस साझेदारी का उद्देश्य उत्सर्जन में कमी और मृदा में कार्बनिक कार्बन के संचय को प्रभावी ढंग से मापना है।
यह स्टार्टअप प्रकृति-आधारित कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करता है, जिन्हें मुख्य रूप से यूरोपीय कंपनियों को बेचा जाता है। स्टार्टअप का लक्ष्य 2030 तक 1 अरब टन कार्बन को अवशोषित करना है। प्रकृति-आधारित कार्बन क्रेडिट पद्धतियाँ अतिरिक्त राजस्व उत्पन्न करने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी कम कर सकती हैं। इनकी मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) विधि में मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग और वैज्ञानिक अनुसंधान का संयोजन उपयोग किया जाता है।
इन सभी उपायों से उन्हें वनीकरण, बायोचार परियोजनाओं और पुनर्योजी कृषि से ग्रीनहाउस गैसों के अवशोषण को सटीक रूप से मापने और उत्सर्जन को सीमित करने में और भी मदद मिलती है। ये पहलें किसानों को उत्पादकता बढ़ाने, फसल पैदावार बढ़ाने, जल संरक्षण करने, जैव विविधता को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन बढ़ाने में सहयोग करती हैं ।
वराह के सह-संस्थापक और कृषि इंजीनियर मधुर जैन ने कहा, “हमें उम्मीद है कि अगले छह से नौ महीनों में हमारी कुछ सक्रिय बातचीत होगी। आज पश्चिमी देशों में प्रीमियम कीमत चुकाने की इच्छा सबसे अधिक है; इसलिए, हमारा मुख्य ध्यान उसी पर रहा है। लेकिन हम अगले चार से पांच वर्षों में इस प्रवृत्ति में बदलाव और भारत में भी इसके आने की उम्मीद करते हैं।”
कार्बन क्रेडिट विकसित करने वाली इस स्टार्टअप कंपनी ने निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है। यह कंपनी भारत, बांग्लादेश, नेपाल और केन्या में 700,000 लाख एकड़ से अधिक भूमि पर फसल उगाने वाले हजारों छोटे किसानों के साथ सहयोग करके ये क्रेडिट उत्पन्न करती है।
कृषि क्षेत्र में कार्बन कैप्चर का महत्व
किसान आमतौर पर कुछ विशेष पद्धतियों का पालन करते हैं, जिनके परिणामस्वरूप समय के साथ कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है। मधुर जैन ने बताया कि जब किसान धान की खेती के लिए अपने खेतों में पानी भरते हैं , तो पानी की परत मिट्टी और वातावरण के बीच एक अलगाव पैदा कर देती है। इससे मीथेन उत्सर्जित करने वाले बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।
चावल से निकलने वाले मीथेन उत्सर्जन का वैश्विक कुल उत्सर्जन में 12% हिस्सा है, जो जलवायु परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है। किसान चावल की खेती में पानी का उपयोग कम करके इस प्रभाव को कम कर सकते हैं।
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यह काम किस प्रकार करता है?
भारत स्थित वराहा कंपनी कार्बन क्रेडिट के माध्यम से फसल अवशेष जलाने और धान के खेतों में बाढ़ आने जैसी समस्याओं को कम करने का प्रयास करती है, जिसमें किसानों को बिक्री मूल्य का 60% से 65% हिस्सा मिलता है। स्टार्टअप कंपनी कार्बन क्रेडिट की श्रेणी के आधार पर 20% से 25% तक कमीशन रखती है, जबकि उसके साझेदारों को 10% से 15% तक कमीशन मिलता है।
श्री जैन ने आगे कहा, "वराहा एनजीओ वेरा के साथ काम करता है , जो एक महत्वपूर्ण कार्बन क्रेडिटिंग कार्यक्रम चलाता है, ताकि क्रेडिट उत्पन्न करने से पहले उसके डेटा और मापन प्रथाओं का ऑडिट किया जा सके।"
कंपनी के अनुसार, उन्होंने अपने मुख्य ग्राहकों के साथ विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से 230,000 से अधिक कार्बन क्रेडिट का अनुबंध किया और बेचा है। इसके अलावा, उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम की तकनीकी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों से भी रुचि मिली है।
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संस्थापक और फाउंडेशन के बारे में
कृषि इंजीनियर मधुर जैन ने भारत में किसानों के साथ अपने 17 वर्षों के अकादमिक और पेशेवर अनुभव का उपयोग करते हुए, अंकिता गर्ग (सीओओ) और विशाल कुचनूर (सीटीओ) के साथ मिलकर 2022 में वराह की सह-स्थापना की।
कई साल पहले, श्री जैन नोबेल पुरस्कार विजेता माइकल क्रेमर के साथ प्रेसिजन एग्रीकल्चर फॉर डेवलपमेंट में भारत के कंट्री डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे थे । तभी उन्हें किसानों को फसल अवशेष जलाने की गतिविधियों को सीमित करने के लिए प्रोत्साहित करने की अत्यावश्यक आवश्यकता का एहसास हुआ। क्योंकि उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह जलाना सर्दियों में घने धुंध की चादर में योगदान देता है ।
उस समय कृषि से कार्बन क्रेडिट बनाने के लिए कोई विधि उपलब्ध नहीं थी। लेकिन जब यूरोप और अमेरिका सहित बाज़ार में ये विधियाँ आने लगीं, तो वराह ने अपना उद्यम शुरू करने का फ़ैसला किया।
स्रोत : वराह



